शैक्षिक स्तर का अर्थ
मनोवैज्ञानिक रूप से एक अवस्था विशेष के बालकों के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित करने को शैक्षिक स्तर कहा जाता है। यह ध्यान रखा जाता है कि बालक उसका ज्ञान इस प्रकार प्राप्त कर लें कि उस स्तर की सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक दोनों परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सकें और प्राप्त किये हुए ज्ञान का अपने जीवन में प्रयोग कर सकें। समय-समय पर किये गये सर्वेक्षण एवं परीक्षणों द्वारा ज्ञात हुआ है कि हमारे देश में शैक्षिक स्तर सामान्य से निम्न है। नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण तथा दूर-दराज के क्षेत्रों में बालक-बालिकाओं को शैक्षिक स्तर पर्याप्त निम्न है। शैक्षिक स्तर को निम्न होना अपने आप में एक गम्भीर समस्या है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में अपव्यय तथा अवरोधन की समस्या भी प्रबल है।
शैक्षिक स्तर के निम्न होने के कारण
वर्तमान में प्रतिवर्ष अनुत्तीर्ण छात्रों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। सन् 1992 की बोर्ड की हाईस्कूल परीक्षा में मात्र 13 प्रतिशत विद्यार्थी उत्तीर्ण हो सके। इसके साथ ही उत्तीर्ण छात्रों में प्राप्त किये हुए ज्ञान को व्यवहार में प्रयोग करने की क्षमता भी घटती जाती है। यह शैक्षिक स्तर की एक महत्वपूर्ण समस्या है। शैक्षिक स्तर गिरने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं।
1. शिक्षण पद्धति तथा शिक्षकों की अयोग्यता :
आज की दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति और शिक्षकों की अयोग्यता के कारण ही शिक्षा का स्तर बहुत गिर गया है।
2. कम वेतन एवं सुविधाएँ :
शैक्षिक स्तर गिरने का एक मुख्य कारण यह है कि अध्यापकों को वेतन बहुत कम मिलता है और उन्हें सुविधाएँ भी कम मिलती हैं। आर्थिक संकट के कारण वे ट्यूशन करते हैं और अपनी कक्षाओं में अध्ययन के प्रति उदासीन रहते हैं।
3. शिक्षा संगठन दोषपूर्ण :
दोषपूर्ण शिक्षा संगठन के कारण भी शैक्षिक स्तर को ऊँचा नहीं उठाया जा सकता है। कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या इतनी अधिक रहती है कि शिक्षक न तो ठीक से अनुशासन रख पाता है और न सभी छात्रों से व्यक्तिगत सम्पर्क ही रख पाता है। परिणामस्वरूप शिक्षक अध्ययन कार्य को एक भार समझ लेता है और शिक्षा के स्तर पर कोई ध्यान नहीं देता।
4. प्रबन्ध समितियों का अनुचित हस्तक्षेप :
प्रबन्ध समितियाँ शिक्षा संस्थाओं के कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप व अध्यापकों का शोषण करती हैं, जिससे शिक्षक सदा मानसिक अशान्ति से ग्रस्त रहने हैं और पूरी कर्तव्यपरायणता से कार्य नहीं करते।
5. पाठ्यक्रम निर्धारण में शिक्षकों की उपेक्षा :
पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय शिक्षकों की पूर्णरूप से उपेक्षा की जाती है। पाठ्यक्रम का निर्धारण वे व्यक्ति करते हैं, जो शिक्षा के सिद्धान्तों एवं शिक्षण पद्धति तथा शिक्षकों की शिक्षण प्रणालियों से अनभिज्ञ होते हैं। कभी-कभी पाठ्यक्रम इतना अयोग्यता विस्तृत बना दिया जाता है कि शिक्षक किसी-न-किसी प्रकार पाठ्यक्रम को पूरा कर पाते हैं परन्तु शिक्षा के स्तर पर ध्यान नहीं दे पाते।
6. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली :
वर्तमान परीक्षा प्रणाली भी हस्तक्षेप अत्यन्त दोषपूर्ण है। अध्यापकों को इतनी अधिक संख्या में उत्तर-पुस्तिकाएँ जाँचने को दी जाती हैं कि छात्रों के कार्य का सही की उपेक्षा तरीके से मूल्यांकन नहीं हो पाता है।
7. परीक्षा में अनुचित साधनों का प्रयोग :
शिक्षकों की उदासीनता और विद्यालयी वातावरण के कारण सत्र के प्रारम्भ में छात्र पढ़ाई में बिल्कुल ध्यान नहीं देते और परीक्षा के समय के अनुचित साधनों का प्रयोग करके उत्तीर्ण होने की चेष्टा करते हैं। परीक्षा में नकल करने की प्रवृत्ति ने शिक्षा के स्तर को अत्यधिक गिरा दिया है।
8. अनुशासनहीनता :
आजकल छात्रों में अनुशासनहीनता भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। हड़ताल व विद्यालय की तालाबन्दी एक आम बात हो गयी है। इस कारण छात्र अपना ध्यान अध्ययन कार्य पर केन्द्रित नहीं कर पाते हैं।
9. समाज का दूषित वातावरण :
आज के समाज में व्याप्त दलबन्दी, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि ने विद्यालय के वार्तावरण को भी दूषित कर दिया है, जिसका कुप्रभाव छात्रों के अध्ययन पर पड़ता हैं।
10. विद्यालयों में शैक्षिक सुविधाओं का अभाव :
बहुत – से विद्यालयों में भवनों तथा शैक्षिक सामग्री का अभाव पाया जाता है, परिणामस्वरूप अध्यापन कार्य सुचारु रूप से नहीं चल पाता है।
11. राजनीतिक गतिविधियाँ :
विभिन्न राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों के लिए शिक्षण-संस्थाओं में भी विभिन्न प्रकार की राजनीतिक गतिविधियाँ सक्रिय रखते हैं। छात्र-संघ के चुनावों के अवसर पर ये गतिविधियाँ अधिक बढ़ जाती हैं। इन परिस्थितियों में छात्रों की शिक्षा सुचारु रूप से नहीं चल पाती तथा शैक्षिक स्तर निम्न हो जाता है।
समस्याओं का समाधान
शैक्षिक स्तर के निम्न होने की समस्या का समाधान करने और शैक्षिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए सरकार को निम्नलिखित उपाय करने चाहिए
⦁ पूर्व : प्राथमिक और प्राथमिक कक्षाओं से ही शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयास किया जाए।
⦁ शिक्षा के संगठन और प्रशासन को चुस्त और व्यवस्थित किया जाए।
⦁ विद्यालयों में प्रबन्धकों का अनुचित हस्तक्षेप बन्द किया जाए और शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए।
⦁ शिक्षकों को समय पर उचित वेतन दिया जाए और अन्य आवश्यक सुविधाएँ प्रदान की जाएँ।
⦁ पाठ्यक्रम को वैज्ञानिक और व्यवस्थित रूप दिया जाए।
⦁ शिक्षकों की ट्युशनबाजी की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जाए।
⦁ विद्यार्थी को प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही कक्षा में प्रवेश दिया जाए।
⦁ पाठ्यक्रम सम्बन्धी गैस पेपर्स व कुंजियों आदि पर रोक लगाई जाए।
⦁ छात्रों के हित के लिए निर्देश एवं परामर्श केन्द्रों की स्थापना की जाए।
⦁ परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए।